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राजस्थान में जानें कब लगेगा बेणेश्वर मेला, जहां आदिवासी समुदाय करते हैं दिवंगत पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन

आदिवासियों का कुंभ कहे जाने वाले बेणेश्वर मेले राजस्थान के डूंगपुर में लगने जा रहा है. इस मेले में आदिवासी समुदाय अपने दिवंगत पूर्वजों की अस्थियां (अस्थि विसर्जन) प्रवाहित करते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं

राजस्थान में ‘आदिवासियों का कुंभ’ कहे जाने वाले बेणेश्वर मेले का आगाज होने वाला है. जिसमें आस्था, संस्कृति और परंपरा का एक शानदार संगम देखने को मिलता है. यह मेला सदियों से नदियों के पवित्र संगम पर सदियों पुराने रीति-रिवाजों, आदिवासी विरासत, लोक संगीत को जीवंत करता चला आ रहा है. इसे राज्य के आदिवासी समुदाय द्वारा हर साल आयोजित किया जाता है. जिसे डूंगरपुर में सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर आयोजित किया जाता है. इस मेले में आदिवासी समुदाय अपने दिवंगत पूर्वजों की अस्थियां (अस्थि विसर्जन) प्रवाहित करते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं

आदिवासी करते है अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियां प्रवाहित

इस मेले का बेनेश्वर नाम डूंगरपुर के शिव मंदिर में स्थित पवित्र शिवलिंग से लिया गया है. स्थानीय भाषा (वागड़ी) में ‘बेनेश्वर’ का अर्थ है ‘डेल्टा का स्वामी’. जिसे माही और सोम नदियों के जरिए निर्मित डेल्टा में आयोजित किया जाता है. यह मेला माघ महीने की शुक्ल पूर्णिमा तक चलता है. इस साल बेणेश्वर मेला डूंगरपुर में 28 जनवरी से लेकर 1 फरवरी तक लगेगा. जिसमें गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान के श्रद्धालु भाग लेते हैं. माना जाता है कि इस मेले में आदिवासी अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियां पवित्र त्रिवेणी संगम में प्रवाहित करने आते है जिससे उन्हें मोक्ष मिल सके. इसके अलावा यहां भगवान शिव और विष्णु (वामन/कलगी अवतार) का मंदिर है, जहां लोग दर्शन करने आते हैं

आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक

इस मेले के लगने पीछे एक कहानी बताई गई है जिसमें कहा जाता है कि संत मावजी महाराज के दो शिष्यों, अजे और वाजे ने सोम और माही नदियों के संगम के पास लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण कराया था. और माघ शुक्ल एकादशी को मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा का समारोह संपन्न कराया था. तब से इसी दिन यह मेला हर साल 5 दिनों को लिए आयोजित किया जाता है. इस मेले को भील जनजाति के लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं. जिसे देश का सबसे बड़ा आदिवासी मेला माना जाता है

बनेश्वर महादेव की होती है पूजा

इस मेले के पहले दिन यानी माघ शुक्ल एकादशी पर मठाधीश कहलाने वाले पुजारी सबला से एक विशाल जुलूस में मेले स्थल पर पहुंचते हैं. घोड़े पर सवार मावजी की 16 सेंटीमीटर की चांदी की प्रतिमा भी यहां लाई जाती है. ऐसा माना जाता है कि मठाधीश के स्नान करने से नदी का जल पवित्र हो जाता है. इसलिए लोग उनके साथ नदी में स्नान करते हैं. इसके अलावा इस दिन भील जनजाति के लोग अपने मृतकों की अस्थियां नदियों के संगम पर विसर्जित करते हैं.बनेश्वर मेला मुख्य रूप से एक आदिवासी मेला है, जिसमें आधे से अधिक लोग भील समुदाय से आते हैं. वे बनेश्वर महादेव और मावजी की पूजा करते हैं. अधिकांश लोग डूंगरपुर, उदयपुर और बांसवाड़ा जिलों से आते हैं

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