
जयपुर: अलवर. ‘नई दिशा का मतलब क्या होता है, हमें यह नहीं पता था. सुलभ में हमें सब कुछ सिखाया. आज वही दुनिया पास बुलाती है, जिसने कभी दुत्कारा था.’ यह कहना है मैला ढोने का काम छोड़कर सुलभ इंटरनेशनल संस्था के साथ जुड़कर कार्य करने वाली महिलाओं का. कभी मैला ढोने का काम करने वाली अलवर की 120 से ज्यादा महिलाओं का जीवन अब संवर रहा है. मैला ढोने का परंपरागत काम को छोड़कर अब महिलाएं नई दिशा सेंटर के साथ जुड़कर नए उत्पाद तैयार कर रही हैं. इससे उन्हें अच्छी आजीविका हो रही है. साथ ही लोग अब खुद उनसे जुड़कर उनकी ओर से तैयार किए उत्पाद खरीद रहे हैं. वहीं, कभी पढ़ाई-लिखाई से दूर रहने वाली महिलाओं के बच्चे अब अपना भविष्य संवारने की राह पर निकल पड़े हैं
अलवर शहर निवासी बबीता ने बताया कि उन्होंने शुरुआत से ही मैला ढोने का कार्य किया, लेकिन 2008 के बाद उनकी जिंदगी में बदलाव आया और उन्होंने मैला ढोने के कार्य को बंद कर सुलभ संस्था के साथ जुड़कर काम करना शुरू किया, जब वह मैला ढोने का कार्य करती थी तो सर पर पराती रखकर जाती थी, फिर बारिश आए या तूफान काम करने जाना पड़ता था. इसमें कई बार तकलीफ का भी सामना करना पड़ता था. कई बार यह भी मन में आया है कि यह काम सिर्फ हमारे लिए ही क्यों लिखा गया? लेकिन अलवर में बिंदेश्वर पाठक के आने के बाद महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया
पहले करते दूर से बात, अब बुलाते हैं घर:
महिला बबीता ने बताया कि सुलभ से जुड़ने के बाद महिलाओं की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि कभी जो लोग दूर से बात करते थे, वही लोग आज अपने घर बुलाते हैं. साथ ही महिलाएं उनके तैयार किए गए उत्पादों को खरीदती हैं. अलवर के नई दिशा सेंटर पर महिलाएं कई उत्पाद तैयार करती हैं. इसमें पापड़, अचार, सीमी, मुरब्बा, मंगौड़ी, सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर का कार्य सहित विभिन्न तरह के कार्य शामिल हैं
मैला ढोने से नहीं चलता था खर्च:
बबीता ने बताया कि मैला ढोने का कार्य करने के दौरान उन्हें महीने में कभी 500 रुपए मिलते तो कभी 800 और इससे घर का खर्च चलाना भी मुश्किल था, लेकिन जबसे वह नई दिशा से जुड़कर उत्पाद तैयार करने लगी तो उनकी आजीविका भी अच्छी हो रही है, जिससे उनका घर खर्च अच्छे से चल रहा है. उन्होंने बताया कि मैला ढोने वाली महिलाओं की ओर से तैयार किया गया सामान अलवर जिले में बिकने के साथ खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड व दिल्ली तक भी जाता है. सुलभ से जुड़ने के बाद उनकी दो बेटियों की अच्छे से शादी हुई. साथ ही उनका बेटा प्राइवेट कंपनी में काम कर रहा है
स्टॉल पर खरीदारी करती महिलाएं:
टोंक की महिला सुनीता ने बताया कि 2009 से उन्होंने मैला ढोने का काम छोड़कर नई दिशा के साथ जुड़कर अपनी एक नई जीवन की शुरुआत की. पहले का जीवन कठिनाइयों भरा था. उनके जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं हुईं, जिससे उन्हें घर आकर रोना पड़ा. उस दौरान वह सोचती कि लोग घर में पशुओं को पालते हैं, लेकिन मनुष्य से इतनी घृणा क्यों? इसका जवाब उन्हें तब मिला, जब उन्होंने मैला ढोने का काम छोड़कर एक नई शुरुआत की. आज लोग उन्हें अपने घर बुलाते हैं. आज महिलाएं नई दिशा के साथ जुड़कर जूट के बैग, सजावटी सामान, नमदा सहित कई उत्पाद बनाती हैं. पहले इसके लिए उन्हें ट्रेनिंग मिली, इसके बाद अब वह खुद बनाकर इन्हें बेचती हैं
घरों से मिलने वाली रोटी पर थे आश्रित:
सुनीता ने बताया कि मैला ढोने का काम करने के दौरान उन्हें घर-घर से रोटी मिलती थी. इसी पर उन्हें आश्रित रहना पड़ता था, फिर चाहे वह कितने दिन पुरानी हो, लेकिन आज बदलाव के बाद वह खुद अपनी कमाई से राशन लेकर आती हैं और अच्छे से अच्छा खाना बनाकर परिवार के साथ खाती हैं. उन्होंने बताया कि मैला ढोने के काम में कोई कमाई नहीं थी, लेकिन अब घर का गुजारा अच्छे से हो रहा है. उनके समाज के लोग शुरुआत से ही मैला ढोने का काम करते थे, जिसके चलते पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं. अब हम यह चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़े और आगे बढ़ें. उनकी बेटी स्टेनो का कोर्स कर रही है, जिससे उसका भविष्य संवर सक
डिजिटल लिटरेसी पर करेंगे काम:
सुलभ संस्था की कार्यकारी संयोजक नित्या पाठक ने बताया कि डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने महिलाओं को मैला ढोने का काम से छुटकारा दिलाकर जीवन की नई शुरुआत की. अब जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, महिलाओं को डिजिटल युग से जोड़ने की तैयारी की जा रही है, जिससे कि महिलाएं कंप्यूटर, लैपटॉप व मोबाइल सीखकर खुद भी आगे बढ़ें. साथ ही अपने उत्पादों को भी ऑनलाइन बेच सकें. अलवर में 115 से ज्यादा महिलाएं नई दिशा सेंटर पर आकर नई नई चीजें सीख रही हैं. वहीं, टोंक में भी करीब 100 महिलाएं उनके संस्थान के साथ जोकर अपनी जिंदगी में बदलाव ला रही हैं



