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जयपुर: ‘हम भी देश के नागरिक, हमारा भी मतदान का अधिकार’ अनाथालयों के युवा की SIR प्रक्रिया पर बड़ा सवाल

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जयपुर: ‘हमारा कोई नहीं है, लेकिन इस देश के नागरिक हैं. हमें भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदान का अधिकार चाहिए.’ हजारों ऐसे युवा हैं जो ये सवाल कर रहें. प्रदेश में चल रहे SIR अभियान में अनाथालयों, चाइल्ड केयर होम और संप्रेषण गृहों में रह रहे युवाओं सहित प्रदेश के अनाथ आश्रम में रहने वाले बच्चों के पास स्थाई पता नहीं होने के चलते मतदाता सूची में नाम नहीं जुड़ पा रहा है. चुनाव आयोग अभी मतदाता सूची का गहन परीक्षण ने 2002 की मतदाता सूची को आधार मान कर उनके मतदाताओं को पहचान करने का काम कर रहा है

जिनके पास घर नहीं, उनकी पहचान कैसे:

मैं सोनू ( बदला हुआ नाम ) हूं. जब से मैंने होश संभाला तब से आश्रम में बड़ा हुआ. वहीं रहते हुए पढ़ाई की. अब मैं 18 साल का हो गया. इस देश का नागरिक होने के नाते मैं अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास मेरी पहचान का आधार कार्ड भी नहीं है. क्या मैं कभी देश का मतदाता बन सकूंगा?’ इस तरह से मोइन ( बदला हुआ नाम) कहता है कि ‘मुझे बचपन से ही अन्य लोगों ने पाला फिर मुझे कोर्ट ने बालिका गृह भेज दिया. यहां रहकर मैंने 12वीं कक्षा पास की. इसके बाद में किराए के मकान में रहता हूं और एक हार्डवेयर की दुकान पर काम करता हूं. मेरे पास मेरी पहचान के लिए आधार कार्ड है, लेकिन बावजूद इसके मेरा नाम मतदाता सूची में नहीं जुड़ रहा है. क्या मैं भी कभी मतदाता बन पाऊंगा?’ प्रदेश के अनाथालयों, चाइल्ड केयर होम और संप्रेषण गृहों में रह रहे युवाओं यही सवाल कर रहे हैं. चुनाव आयोग अभी मतदाता सूची का गहन परीक्षण कर रहा है. 2002 की मतदाता सूची को आधार मान कर उनके मतदाताओं को पहचान करने का काम कर रहा है. ऐसे में इन बच्चों का क्या होगा?

निर्वाचन आयोग करे विशेष प्रावधान:

सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल कहते हैं कि जहां घर होते हैं, वहां तक पहुंचना आसान है, लेकिन जिनके पास घर ही नहीं? अनाथालयों, चाइल्ड केयर होम और संप्रेषण गृहों में रह रहे या यहां रहने के बाद बाहर निकले युवाओं के सामने SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में नाम जुड़वाना मुश्किल हो रहा है या जिनके माता-पिता का अता पता ही नहीं है और वो सिर्फ अपनी पहचान पर या किसी संस्था के सहयोग से अपना जीवन यापन कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि प्रदेश में हजारों बच्चे हैं जिनके परिवार, माता-पिता का कुछ पता नहीं, उनके पास स्थाई पता भी नहीं है. निर्वाचन आयोग SIR प्रक्रिया के नियमों में इसके लिए कोई रियायत या कोई ऐसा प्रावधान नहीं है, जिससे इनका नाम मतदाता सूची में जुड़े. सामान्य प्रक्रिया के तहत जो प्रावधान है उसके अनुसार सेंटर होम से लिखवा कर मतदाता सूची में नाम जोड़ा जा सकता है, लेकिन 2002 के नियम को ये बच्चे कैसे पूरा करें ? इतना ही नहीं जो बच्चे सेंटर होम से निकल गए उनके लिए अब सेंटर होम से भी लिखित पत्र नहीं बन रहा है.

मतदान अधिकार और पात्रता:

नागरिकता और आयु:

मतदान का प्राथमिक मानदंड भारतीय नागरिकता और न्यूनतम 18 वर्ष की आयु है. अनाथ बच्चों को भी जन्म से भारत का नागरिक माना जाता है, इसलिए ये अधिकार उन पर भी लागू होते हैं

पेरेंट्स पैट्रिया सिद्धांत:

किसी बच्चे के माता-पिता नहीं हैं, तो राज्य (सरकार) ‘पैरेंट्स पैट्रिया’ के सिद्धांत के तहत उनके अभिभावक के रूप में कार्य करता है. यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें शिक्षा और जीवन के अधिकार सहित सभी मौलिक अधिकार मिलें.

मतदाता सूची में पंजीकरण:

18 वर्ष की आयु पूरी करने पर, किसी भी अन्य नागरिक की तरह, अनाथ व्यक्ति को भी चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना होता है.

समानता का अधिकार : संविधान के अनुसार, हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैं. अनाथ होना किसी व्यक्ति को उनके नागरिक अधिकारों, जैसे मतदान के अधिकार, से वंचित नहीं करता है. अनाथ बच्चे पूरी तरह से देश के नागरिक हैं और वयस्क होने पर उन्हें मतदान करने का पूरा अधिकार है

भारतीय नागरिकता पर भी सवाल:

इन बच्चों के मतदाता सूची में नाम जुड़वाने को लेकर काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता लता सिंह कहतीं हैं कि यह उन बच्चों के लिए बहुत चैलेंज का समय है, जो आश्रम या चाइल्ड केयर संस्थानों में रहते हैं. SIR की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 2002 की लिस्ट को आधार बनाया गया है, लेकिन उन बच्चों की कोई आइडेंटिटी नहीं है और न ही उनके पास 2002 की कोई डिटेल्स है तो ऐसे बच्चों के लिए कोई क्लेरिफिकेशन ही नहीं आया है कि कैसे उनकी मैपिंग की जाएगी? अभी तक उनके कोई आधार कार्ड भी नहीं बने हैं. कुछ बच्चे ऐसे हैं जो 18 के हो चुके हैं और कुछ होने वाले हैं, लेकिन उनके पास अभी तक वोटिंग राइट नहीं है. उन्होंने साफ कहा कि अगर वह इस बार SIR से भी छूट जाते हैं तो कहीं ना कहीं भारतीय नागरिकता पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. निर्वाचन आयोग को चाहिए कि इन बच्चों को विशेष केस में शामिल करते हुए नियमों में शिथिलता दें, ताकि इन्हें भी भारतीय कहलाने का हक मिले

SIR फॉर्म में तीन विकल्प दिए गए हैं:

पहला: यदि व्यक्ति का नाम पहले से मतदाता सूची में है.

दूसरा: नाम नहीं है, लेकिन किसी परिवार सदस्य जैसे माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी का नाम शामिल है, तो वंशावली मैपिंग किया जाता है. जहां यह दोनों ही ऑप्शन नहीं है वहां तीसरे ऑप्शन का इस्तेमाल किया जाता है.

तीसरा: रिश्तेदारी या परिवार का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं, तो किसी भी एक आधार दस्तावेज जैसे बर्थ सर्टिफिकेट, स्कूल रिकॉर्ड या संस्थान (अनाथालय) का प्रमाण पत्र आधारित मैपिंग की जाती है.

क्या कहते हैं नियम:

राजस्थान में वर्तमान मतदाता सूची के अनुसार 5 करोड़ 48 लाख 84 हजार 827 मतदाता हैं. इसमें 2.84 करोड़ पुरुष, 2.65 करोड़ महिलाएं और 681 अन्य मतदाता शामिल हैं. इनकी विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत BLO हर घर जाकर गणना प्रपत्र भरवा रहे हैं. प्रदेश में 100 फीसदी मैपिंग कर चुके बाड़मेर जिला की निर्वाचन आयोग टीना डाबी कहती हैं कि भारत में, अनाथ बच्चों को भी 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर मतदान का अधिकार है, बशर्ते वे भारत के नागरिक हों और अन्य सामान्य पात्रता मानदंडों को पूरा करते हैं. भारतीय संविधान धर्म, जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव किए बिना सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है. किसी भी एक आधार दस्तावेज जैसे बर्थ सर्टिफिकेट, स्कूल रिकॉर्ड या संस्थान (अनाथालय) का प्रमाण पत्र आधारित मैपिंग की जाती है. इसी विकल्प का इस्तेमाल करके उन बच्चों और युवाओं की मैपिंग की गई है, जो अनाथालयों और चाइल्ड केयर संस्थानों में रहते हैं, जिन्हें न परिवार का नाम पता है, न एड्रेस उपलब्ध है

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