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जयपुर: ऊंट-पैदल यात्रा से बीएलओ पहुंचे ढाणियों तक थार के मरुस्थल में लोकतंत्र ने फिर रोशन किया अपना दीप

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जयपुर: लोकतंत्र की शक्ति केवल शहरों में नहीं, बल्कि उन ढाणियों तक भी पहुंचती है, जहां ऊंट के पदचिह्न ही एकमात्र रास्ता हैं। थार मरुस्थल के कठिन भूगोल में लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया—मतदाता सूची अद्यतन—को मजबूत करने के लिए जैसलमेर जिले के शाहगढ़ क्षेत्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर)-2026 अभियान अभूतपूर्व समर्पण के साथ जारी है। रेत के अनंत विस्तार, बिखरी ढाणियों और कठोर प्रकृति के बीच बीएलओ ने वह कार्य संभव किया है, जिसे सामान्य परिस्थितियों में कठिन नहीं, बल्कि लगभग असंभव माना जाता है। शाहगढ़, हरनाऊ और मांधला ग्राम पंचायत क्षेत्रों में कार्यरत बीएलओ ने जिस तरह हर योग्य नागरिक तक पहुंचकर नामांकन सुनिश्चित किया, वह मरुस्थलीय जीवन में लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की अद्वितीय मिसाल है।

थार का वह इलाका, जहां तक पहुंचना भी चुनौती:

शाहगढ़ क्षेत्र पूर्णत: मरुस्थल में स्थित है। लगभग 6025 वर्ग किलोमीटर के इस इलाके में 109 राजस्व ग्राम हैं और अनेक ढाणियों में केवल 4-5 परिवार रहते हैं। कई ढाणियों तक पहुंचने का रास्ता न वाहन लायक, न स्थिर—कई बार केवल ऊंट या पैदल यात्रा ही विकल्प। कई बीएलओ को 70-80 किलोमीटर का दूरस्थ क्षेत्र कवर करना पड़ता है, जबकि ऑनलाइन डेटा अपलोड करने का केंद्र 80-90 किलोमीटर दूर स्थित है। न बिजली, न नेटवर्क—काम का अधिकांश हिस्सा ऑफलाइन मेहनत से पूरा करना पड़ता है। इन क्षेत्रों के बीएलओ कभी तपी रेत पर घंटों पैदल चलते हैं, कभी ऊंट की सवारी करते हुए दूरस्थ ढाणियों तक पहुँचते हैं। सर्दियों में पशुपालक परिवार तीन बार ढाणियाँ बदलते हैं, ऐसे में इनके दस्तावेज जुटाना, पहचान सत्यापन करना और फॉर्म भरवाना अत्यंत कठिन कार्य है।

फ़ोटो बना सबसे बड़ी चुनौती:

सबसे बड़ी चुनौती फोटो की रही। नजदीकी कस्बा 150 किलोमीटर दूर, वहां जाना अधिकांश परिवारों के लिए असंभव। इस स्थिति में बीएलओ ने स्वयं घर-घर जाकर मोबाइल से फोटो ली, फॉर्म भरे और बाद में केंद्र पर जाकर सभी डेटा अपलोड किया।शाहगढ़ क्षेत्र के सरपंच और ग्रामीणों ने बीएलओ की मदद के लिए ऊंट, वाहन, भोजन-पानी और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया। इस सामुदायिक सहयोग ने रेगिस्तान की कठिनाइयों के बीच अभियान को गति दी।

थार में बीएलओ का सफर—कर्तव्य से आगे, प्रेरणा का स्रोत:

तपती दोपहरें, ठंडी हवाएं, दूर-दूर बिखरी ढाणियाँ—इन सबके बीच बीएलओ ने हर परिवार तक पहुंचकर नए मतदाता नामांकित किए, पलायन से लौटे परिवारों का डेटा अपडेट किया और बुजुर्ग मतदाताओं का सत्यापन सुनिश्चित किया।

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